palaash ke phool
केवाड़ियाँ अगर लकड़ी की हों, तो उनमे दीमक लग जाता है। लकड़ी को अगर धूप की रौशनी न मिले, गर्मी न मिले, तो वो ख़राब हो जाती हैं। पहले घरों में रोशनदान हुआ करते थे, सीलन भी कम होती थी। जब दीवारों पर भूरे रंग की रेखाएं उमड़ने लगीं तो ये निश्चित हो चुका था की पेस्ट कण्ट्रोल करवाने की घड़ी आ चुकी है। सभी व्यस्तताओं को अब एक तरफ रख कर खुदको और घर को तैयार करने के सिवा कोई चारा न था। सफाई का काम जब शुरू हुआ तो पता चला की हर अल्मिराह को भी खाली करना होगा। जिस घर में अल्मीरों की कमी न हो, और उनमे रखे सामान राइ बराबर हों,तो ये अपने आप में एवेरेस्ट फतह करने से कम न थी। "देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं", ढांढस बांधने को सब दबी सांसों से यह बुदबुदाते रहे । इसी दौरान जब स्टोर की सफाई चालु हुयी तो किताबों के लोहों के रैक के ऊपर के माल्हे से किताब उतारे गए। उनके साथ उतरे, उन किताब कॉपियों में लिख कर भुला दी गयीं बातें। ये उन्ही भूली हुयी बातों में उलझी हुयी किसी एक बात के रेशें हैं। इनकी तारें अन्य किन बातों से जुडी हु...