आसमान शाम और रात के बीच के अपने अंतर को धीरे धीरे खतम करने को है, नेवी ब्लू हो चुके आसमान के नीचे फैले हुए ज़मीन पर जहाँ मेरे पाऊँ हैं, वहां से एक गली निकल आयी है, जो मेरे नज़र के सामने ही संकीर्ण होने लगी है। जैसे जैसे गली के किनारे एक दूसरे के करीब आने लगते हैं, वैसे-वैसे उन किनारों में इमारतें उगने लगनी है, मेरे नज़रें जल्दी से इधर-उधर दौड़ती हैं - एक से दो माल्हे के ये ईमारत घर और दुकानों का स्वरुप लेने लगते हैं , जोन्स अब लोग निकल कर गली में जमा होने लगे हैं। ये लोग मुझसे जवाब चाहते हैं। उन्हें आता देख, मेरे पाऊँ लड़खड़ाते हैं , और मैं भागने लगती हूँ। अगर मैं उस गली से नहीं निकली तो वे लोग मुझे अपने जवाब की मांग में गिरफ्त कर लेंगे। जहाँ मेरे पाऊँ धरती को छूते हैं, वहां की ज़मीन धसने लगती है, सो मेरी रफ़्तार और तेज़ हो जाती है। शायद मुझे यूं दौड़ने की आदत नहीं होगी। लोग भी मेरे पीछे तेज़ गति से चलने लगे हैं, मानो वो समझ चुके हैं की अगर मैं इस गली से निकल गयी तो अपने साथ उनके जवाब भी लेकर जाउ...