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उसने पूछा फिर?

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उसने पूछा फिर? जब रात ढली  और सुबह खिली  तब एक गली  भीगी हलकी  भीनी सी नमीं -  कहीं तो गूंजी  एक तेज़ ध्वनि  और थामे गति  वो देख चली,  छन से जो कभी वो जिधर मुड़ती  बहने लगती  जीवन लय ही।     उसने पूछा फिर ? हर ताल वही  सुर में लिपटी  चिंगारी सी  थोड़ी चुभती  बन हवा लहकी  कभी सहलाती  माया बुनती  स्वाँगें रचती  वो जो ठहरी  जीवन लय की  प्रवाह बहकी    थमती सृष्टि   सृजन ऊँघती।

गली जवाब गति

   आसमान शाम और रात के बीच के अपने  अंतर को धीरे धीरे खतम करने को है, नेवी ब्लू हो चुके आसमान के नीचे  फैले हुए ज़मीन पर जहाँ  मेरे पाऊँ हैं, वहां से एक गली निकल आयी है, जो मेरे नज़र के सामने ही संकीर्ण होने  लगी है।  जैसे जैसे गली के किनारे  एक दूसरे के करीब आने लगते हैं, वैसे-वैसे उन किनारों  में इमारतें उगने लगनी है, मेरे नज़रें जल्दी से इधर-उधर दौड़ती हैं - एक से दो माल्हे के ये ईमारत घर और दुकानों का स्वरुप लेने लगते हैं , जोन्स अब लोग निकल कर गली  में जमा होने लगे हैं।  ये लोग मुझसे जवाब चाहते हैं।  उन्हें आता देख, मेरे पाऊँ लड़खड़ाते हैं , और मैं भागने लगती हूँ। अगर मैं उस गली से नहीं निकली तो वे लोग मुझे  अपने जवाब की मांग में गिरफ्त कर लेंगे।  जहाँ  मेरे पाऊँ धरती को छूते हैं, वहां की ज़मीन धसने लगती है, सो मेरी रफ़्तार और तेज़ हो जाती है।  शायद मुझे यूं दौड़ने की आदत नहीं होगी।  लोग भी मेरे पीछे तेज़ गति से चलने लगे हैं, मानो वो समझ चुके हैं की अगर मैं इस गली से निकल गयी तो अपने साथ उनके जवाब भी लेकर जाउ...

रेखा रंग ख़ुश्बू

"बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है, जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले, बोल कि सच ज़िंदा है अब तक, बोल जो कुछ कहना है कह ले ...... बोल " हर इक लब्ज़ के साथ धीरे -धीरे उसने अपनी गर्दन उसकी ओर घुमा ली। उसने दिवार पर सर टिका कर आँखें बंद कर लीं थी।  वो डिस्टर्ब न हो सो वो धुनें गुनगुनाता रहा। सामने बैठी वो किसी सोच में उलझी थी।  वो समझ गया क्यूंकि वो जानता था, जब वो कुछ सोचती है तो उसकी भौएं तन जाती है।  मानों उसके विचारो को उन्ही ने खिंच कर रोके रखा है, जितनी गहरी बात, उतने ज़ियादा शिकन।   "रेखाओं को वही देख पाते हैं जो उन्हें लांघना अपनी नसीबों में लिखवाकर लाये हैं।"  अपने सर से दिवार का सहारा छीनते हुए वो एक वेग में उठ खड़ी हुयी। उसके उठते ही रंगों ने अपना रूप लिया।  मानो अब तक सब कुछ ब्लैक एंड वाइट हो - तमाम रंग उसने अपने तलवों के नीचे दबा रखे हो। तलवों के उठते ही रंग अपने कैद से रिहा हो गए।   आदमी ने जब रंगों को यूँ दसों दिशाओं में  रिसता देखा तो वो हँस पड़ा - " कहो, तुम्हारे लिए कोई फूल कैसे लाये? अगर तुम बैठी रह गयी तो वो यूँ ही बेरंग रह जाएंगे। औरत ...

palaash ke phool

 केवाड़ियाँ अगर लकड़ी की हों, तो उनमे दीमक लग जाता है।  लकड़ी को अगर धूप की रौशनी न मिले, गर्मी न मिले, तो वो ख़राब हो जाती हैं। पहले घरों में रोशनदान हुआ करते थे, सीलन भी कम होती थी। जब दीवारों पर भूरे रंग की रेखाएं उमड़ने लगीं तो ये निश्चित हो चुका था की पेस्ट कण्ट्रोल करवाने की घड़ी आ चुकी है।  सभी व्यस्तताओं को अब एक तरफ रख कर खुदको और घर को तैयार करने के सिवा कोई चारा न था।  सफाई का काम जब शुरू हुआ तो पता चला की हर अल्मिराह को भी खाली करना होगा।  जिस घर में अल्मीरों की कमी न हो, और उनमे रखे सामान राइ बराबर हों,तो ये अपने आप में एवेरेस्ट फतह करने से कम न थी।  "देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं",  ढांढस बांधने को सब दबी सांसों से यह बुदबुदाते रहे ।  इसी दौरान जब स्टोर की सफाई चालु हुयी तो किताबों के लोहों के रैक के ऊपर के माल्हे से किताब उतारे गए।  उनके साथ उतरे, उन किताब कॉपियों में लिख कर भुला दी गयीं बातें।   ये उन्ही भूली हुयी बातों में उलझी हुयी  किसी एक बात के रेशें हैं।  इनकी तारें अन्य किन बातों से जुडी हु...