रेखा रंग ख़ुश्बू
"बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है, जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले, बोल कि सच ज़िंदा है अब तक, बोल जो कुछ कहना है कह ले ...... बोल " हर इक लब्ज़ के साथ धीरे -धीरे उसने अपनी गर्दन उसकी ओर घुमा ली। उसने दिवार पर सर टिका कर आँखें बंद कर लीं थी। वो डिस्टर्ब न हो सो वो धुनें गुनगुनाता रहा। सामने बैठी वो किसी सोच में उलझी थी। वो समझ गया क्यूंकि वो जानता था, जब वो कुछ सोचती है तो उसकी भौएं तन जाती है। मानों उसके विचारो को उन्ही ने खिंच कर रोके रखा है, जितनी गहरी बात, उतने ज़ियादा शिकन।
"रेखाओं को वही देख पाते हैं जो उन्हें लांघना अपनी नसीबों में लिखवाकर लाये हैं।" अपने सर से दिवार का सहारा छीनते हुए वो एक वेग में उठ खड़ी हुयी। उसके उठते ही रंगों ने अपना रूप लिया। मानो अब तक सब कुछ ब्लैक एंड वाइट हो - तमाम रंग उसने अपने तलवों के नीचे दबा रखे हो। तलवों के उठते ही रंग अपने कैद से रिहा हो गए।
आदमी ने जब रंगों को यूँ दसों दिशाओं में रिसता देखा तो वो हँस पड़ा - " कहो, तुम्हारे लिए कोई फूल कैसे लाये? अगर तुम बैठी रह गयी तो वो यूँ ही बेरंग रह जाएंगे। औरत सुनकर, कुछ पल चुप रही, चुप रही तो शिकन घटने लगे, आदमी शिकन गिनने लगा। उसकी गिनती समाप्त होने पर औरत मुस्कुराने लगी। "उनकी ख़ुश्बू मुझे उन तक खिंच लाएंगे, कोई अगर मेरे लिए फूल लाएगा तो मैं उठ के भागती हुई उनसे वो स्वीकार कर लूंगी।"
तुम्हारे सोच के उस पार क्या है? आदमी ने पूछा।
मैं कुछ समझी नहीं।
तुमने कहा न की लकीरों को लांघने वाले ही देख पाते हैं ।
हाँ।
तो तुम्हारी ये शिकन मुझे दिखाई देती हैं, मतलब मैं एक दिन इन्हे लांघ जाऊँगा।
अगर तुम वाकई इन्हे लांघ गए तो एक नदी के तट पर पहुँच जाओगे।
और तुम ?
मैं क्या ?
तुम वहां कहाँ मिलोगी ?
आबादी से दूर एक वहीँ किनारे पर छोटा सा वीराना है।
मैं कैसे ढूंढूंगा?
तुम जानो।
मुझे पता है , तुम जहाँ होगी, रंग भी वहीँ होंगे ।
अगर रंग कैदी ही रहे तो ?
तो क्या, तुम्हारी ख़ुश्बू लकीरें बनकर मुझे तुम तक आने का रास्ता दिखाएंगी।
फिर तो तुम्हें उन्हें भी पार करना होगा।
मैं इस लूप में फंसा रह जाऊँगा और तुम हर शुरआत और अंत में मिलती जाओगी।
"बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है, बोल जो कुछ कहना है कह ले"?
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