उसने पूछा फिर?

उसने पूछा फिर?

जब रात ढली 

और सुबह खिली 

तब एक गली 

भीगी हलकी 

भीनी सी नमीं - 

कहीं तो गूंजी 

एक तेज़ ध्वनि 

और थामे गति 

वो देख चली, 

छन से जो कभी

वो जिधर मुड़ती 

बहने लगती 

जीवन लय ही।

   


उसने पूछा फिर ?

हर ताल वही 

सुर में लिपटी 

चिंगारी सी 

थोड़ी चुभती 

बन हवा लहकी 

कभी सहलाती 

माया बुनती 

स्वाँगें रचती 

वो जो ठहरी 

जीवन लय की 

प्रवाह बहकी   

थमती सृष्टि  

सृजन ऊँघती।


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