गली जवाब गति

   आसमान शाम और रात के बीच के अपने  अंतर को धीरे धीरे खतम करने को है, नेवी ब्लू हो चुके आसमान के नीचे  फैले हुए ज़मीन पर जहाँ  मेरे पाऊँ हैं, वहां से एक गली निकल आयी है, जो मेरे नज़र के सामने ही संकीर्ण होने  लगी है।  जैसे जैसे गली के किनारे  एक दूसरे के करीब आने लगते हैं, वैसे-वैसे उन किनारों  में इमारतें उगने लगनी है, मेरे नज़रें जल्दी से इधर-उधर दौड़ती हैं - एक से दो माल्हे के ये ईमारत घर और दुकानों का स्वरुप लेने लगते हैं , जोन्स अब लोग निकल कर गली  में जमा होने लगे हैं।  ये लोग मुझसे जवाब चाहते हैं।

 उन्हें आता देख, मेरे पाऊँ लड़खड़ाते हैं , और मैं भागने लगती हूँ। अगर मैं उस गली से नहीं निकली तो वे लोग मुझे  अपने जवाब की मांग में गिरफ्त कर लेंगे।  जहाँ  मेरे पाऊँ धरती को छूते हैं, वहां की ज़मीन धसने लगती है, सो मेरी रफ़्तार और तेज़ हो जाती है।  शायद मुझे यूं दौड़ने की आदत नहीं होगी।  लोग भी मेरे पीछे तेज़ गति से चलने लगे हैं, मानो वो समझ चुके हैं की अगर मैं इस गली से निकल गयी तो अपने साथ उनके जवाब भी लेकर जाउंगी।  उन्हें अपने करीब आता देख मेरी सांस फूलने लगती है, मैं पसीने से लथपथ हो चुकी हूँ,पर मैं भागना नहीं छोड़ती।  

गली के दोनों सिरे आपस में टकड़ाने ही वाले थे की किसी तरह मैं उससे बाहर  निकल जाती हूँ और अचानक हुई  बहुत रौशनी से मेरी आँखें चौंधिया  जाती हैं, हर ऒर उजाला है, सतह जिसपर मेरे पाऊँ  रुके हैं, दिशाएं जिन्हे मैं हर तरफ फैलता देख रही हूँ , वो जगह मेरे सर के ऊपर जहाँ आसमान को होना चाहिए था, सब कुछ सफ़ेद।  मानो कोई इनपर पुट्ठी तो कर गया, पर रंगों के कनस्तर वाली गाड़ियां कहीं  उस गली में दुर्घटनाग्रस्त हो गई।  जब पीछे मुद कर देखा तो पीछे कुछ भी नहीं था , मैंने कदम उठाने चाहहए तो उनके साथ सतह भी लिपट कर उठने लगी।  हाथ बढ़ाया तो हाथों के इर्द गिर्द रेखाएं उगने लगीं। मुझे इसी बात का डर था, रेखाएं राहों को जनम देती है। 

बस देखते ही देखते राख आस - पास  गिरने लगीं, कॉस्मिक डस्ट, ' अ कलूजन ऑफ़ मटर एंड स्पेस । राख का रंग भी सफ़ेद था, पर वे चमक रहीं थी, तो नज़र आ गयीं। राखों ने बिना देरी किए अपना काम  किया और  वे इमारतों का रूप लेने लगीं।   मेरी हथेली की रेखाओं  के सिरे खुल कर गिरने लगे, वे हवा में तैरतीं रेखाओं  के सिरों से एक - एक कर जुड़ने लगीं। जल्द ही तैरती हवा में एक नई सड़क बन जायेगी  जो भारी होकर गिरेगी और नीचे बिछने लगेगी। रेखा - रंग -  ऊर्जा - तत्व मिलकर सवालों और जवाबों की नई जिरह  बनाएंगे। मैं उनसे भाग न सकूँ  सो मुझे उनकी नींव में ढाल दिया जाएगा।  आसमान रात से सुबह में ढलने को है, जहाँ मेरे पाऊँ थे अब उस सतह पे एक नदी बह रही है। जब कोई  अकिलीज़  इस नदी में अपने पाओं रखेगा तो मैं नींव से रिहा हो जाउंगी।   


ऐसा क्या है? 

जो लिख लूँ तो चैन आ जाए। 

ऐसा क्या है? 

जो जी लूँ तो जान आ जाए। 

ऐसा क्या है? 

जिसके पार हल हैं सारे।  

ऐसा क्या है? 

जिसके परे  हर सवाल पुकारे।   

ऐसा क्या है? 

जिसके जैसा कुछ भी नहीं है ? 

ऐसा क्या है? 

जिसके जैसा सब कुछ ही है ? 

ऐसा क्या है? 

जिसके न तो ऊपर नभ है।

ऐसा क्या है?  

जिसके तो न नीचे ज़मीन है।  

ऐसा क्या है? 

जो जब पुकारे, रात आ जाए। 

ऐसा क्या है? 

जिसक चुप्पी दिन में ढल जाए। 

ऐसा क्या है?  

वो जब सँवारे, मौत आ जाए?

ऐसा क्या  है?  

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